ग्रामीण समाज के बदलते आयाम एवं पंचायतीराज की भूमिका

Authors

  • Ayodhya Singh M.Phil. in Sociology Author
  • Dr. Mahesh Shukla Retired Professor, Department of Sociology, Government Thakur Ranmat Singh Autonomous College, Rewa (M.P.) Author

DOI:

https://doi.org/10.64675/wgrxwa66

Keywords:

ग्रामीण समाज, सामाजिक परिवर्तन, पंचायतीराज, ग्राम पंचायत, साक्षरता, लिंगानुपात, महिला प्रतिनिधित्व, रीवा जनपद।

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र में भारत की जनगणना, पंचायतीराज मंत्रालय एवं अन्य प्रकाशित स्रोतों से प्राप्त द्वितीयक आँकड़ों के आधार पर रीवा जनपद के ग्रामीण समाज के बदलते आयामों तथा उनमें पंचायतीराज की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। जनगणना 2001 एवं 2011 के तुलनात्मक विश्लेषण से ज्ञात होता है कि रीवा जनपद की जनसंख्या में 19.86 प्रतिशत की दशकीय वृ‌द्धि हुई, साक्षरता दर 62.01 प्रतिशत से बढ़कर 71.62 प्रतिशत हो गई तथा महिला साक्षरता में 13.58 प्रतिशत बिन्दु की उल्लेखनीय वृ‌द्धि के कारण साक्षरता का लैंगिक अंतर 28.07 से घटकर 20.27 प्रतिशत बिन्दु रह गया। इसके विपरीत लिंगानुपात 941 से घटकर 931 तथा शिशु लिंगानुपात 926 से घटकर 885 हो गया, जो ग्रामीण समाज में पुत्र वरीयता की निरंतरता का चिंताजनक संकेत है। वर्ष 2011 में जनपद की 83.27 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण थी तथा ग्रामीण एवं नगरीय साक्षरता के मध्य 12.49 प्रतिशत बिन्दु का अंतर विद्यमान था। पंचायतीराज के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की पंचायतों में 51.61 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएँ हैं, जो महिलाओं के पचास प्रतिशत आरक्षण का प्रत्यक्ष परिणाम है। शोध पत्र यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि पंचायतीराज ने ग्रामीण समाज में राजनीतिक प्रतिनिधित्व एवं विकास की पहुँच का विस्तार किया है, किन्तु लैंगिक असमानता, ग्रामीण-नगरीय अंतर एवं शिशु लिंगानुपात में गिरावट जैसी चुनौतियों के समाधान हेतु पंचायतों की सामाजिक भूमिका को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

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Published

2026-09-16