बघेलखण्ड के लोक संस्कृति पर्यटन स्थलों का ऐतिहासिक सर्वेक्षण
DOI:
https://doi.org/10.64675/shodhbodh.v4.i1.33Keywords:
बघेलखण्ड, लोक संस्कृति, बघेली भाषा, आल्हा ऊदल, करमा नृत्य, कजरी गीत, मैहर घराना, जनजातीय संस्कृति, कोल, गॉड, बैगा, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक पर्यटन ।Abstract
बघेलखण्ड, जो वर्तमान मध्य प्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, शहडोल, अनूपपुर तथा उमरिया जिलों में विस्तृत है, केवल धार्मिक स्थलों की दृष्टि से ही नहीं, अपितु अपनी समृद्ध एवं बहुरंगी लोक संस्कृति की दृष्टि से भी भारत के सांस्कृतिक मानचित्र में विशिष्ट स्थान रखता है। इस क्षेत्र में कोल, गोंड तथा बैगा जैसी जनजातियों की जीवन-पद्धति, बघेली भाषा में रचित आल्हा ऊदल जैसी वीर-गाथाएँ, करमा, सैला, अहिररई-लाठी, सजनई तथा कलशा जैसे लोक-नृत्य, कजरी-चैती जैसे कृषि-गीतल, मैहर घराने की शास्त्रीय संगीत परम्परा तथा विविध हस्तशिल्प एवं पारम्परिक मेले मिलकर एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का निर्माण करते हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में बघेलखण्ड के लोक संस्कृति पर्यटन स्थलों का ऐतिहासिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बघेली भाषा-साहित्य, लोक-नृत्य एवं लोक-गीत परम्पराएँ, जनजातीय समुदाय एवं उनके मेले-उत्सव, मैहर संगीत घराना, हस्तशिल्प तथा पारम्परिक वस्त्र, तथा बांधवगढ़ एवं संजय दुबरी जैसे प्रकृति-सांस्कृतिक पर्यटन स्थलों का विश्लेषण सम्मिलित है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों, स्थानीय लोक-साहित्य संकलनों, गजेटियरों तथा समकालीन शोध सामग्री पर आधारित है। निष्कर्ष रूप में यह पाया गया कि बघेलखण्ड की लोक संस्कृति परम्परा शहरीकरण एवं आधुनिकीकरण के दबाव में क्षीण होती जा रही है, जिसके संरक्षण एवं पर्यटन-आधारित पुनर्जीवन हेतु ठोस एवं समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
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