हिन्दी उपन्यासों में पर्यावरण चेतना और प्रकृति चित्रण : एक पारिस्थितिक अध्ययन
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https://doi.org/10.64675/shodhbodh.v4.i1.30Keywords:
हिन्दी उपन्यास, पर्यावरण चेतना, प्रकृति चित्रण, पारिस्थितिक आलोचना, इकोक्रिटिसिज्म, आंचलिक उपन्यास, प्रेमचन्द, फणीश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय, संजीव, विस्थापन।Abstract
हिन्दी उपन्यास साहित्य में प्रकृति का चित्रण आरम्भ से ही एक महत्वपूर्ण उपादान रहा है, परन्तु समय के साथ यह चित्रण केवल अलंकारिक अथवा पृष्ठभूमि-निर्माण के स्तर से आगे बढ़कर एक गहन पारिस्थितिक तथा पर्यावरणीय चेतना के रूप में विकसित हुआ है। प्रस्तुत शोध पत्र में हिन्दी उपन्यासों में निहित पर्यावरण चेतना तथा प्रकृति चित्रण की प्रवृत्तियों का पारिस्थितिक आलोचना अर्थात इकोक्रिटिसिज्म की दृष्टि से विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस अध्ययन में प्रेमचन्द के कृषि-केन्द्रित उपन्यासों से लेकर फणीश्वरनाथ रेणु के आंचलिक उपन्यासों, अज्ञेय के दार्शनिक प्रकृति-चित्रण, संजीव जैसे लेखकों के आदिवासी-विस्थापन तथा पर्यावरण-विनाश केन्द्रित उपन्यासों, तथा समकालीन पारिस्थितिक उपन्यासकारों की रचनाओं का विवेचनात्मक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि हिन्दी उपन्यास साहित्य में प्रकृति चित्रण की परम्परा किस प्रकार क्रमशः अलंकारिक वर्णन से आगे बढ़कर पारिस्थितिक असंतुलन, पर्यावरणीय शोषण तथा मानव-प्रकृति सम्बन्धों के गहन प्रश्नों तक पहुँची है। अध्ययन गुणात्मक तथा विश्लेषणात्मक शोध प्रविधि पर आधारित है, जिसमें चयनित उपन्यासों के मूल पाठ, समीक्षात्मक शोध लेखों तथा साहित्यिक इतिहास ग्रन्थों का उपयोग किया गया है। निष्कर्ष रूप में यह पाया गया कि हिन्दी उपन्यास साहित्य पर्यावरणीय चेतना के प्रसार में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक माध्यम की भूमिका निभा सकता है, परन्तु इस दिशा में और अधिक व्यवस्थित आलोचनात्मक तथा शैक्षणिक कार्य की आवश्यकता है।
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