भारतीय कृषि विकास में वाणिज्यिक बैंकों की भूमिकाः अवसर और चुनौतियाँ
DOI:
https://doi.org/10.64675/v9tv0b05Keywords:
भारतीय कृषि विकास, वाणिज्यिक बैंक, कृषि ऋण, कृषि वित्त, संस्थागत साख, किसान क्रेडिट कार्ड, वित्तीय समावेशन, नाबार्ड, ग्रामीण विकास, कृषि आधुनिकीकरण।Abstract
भारतीय कृषि आज भी रोजगार, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आय का प्रमुख आधार है। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र 2023-24 में भारत के सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) का लगभग 17.7 प्रतिशत योगदान करते हैं, जबकि बड़े ग्रामीण जनसमूह की आजीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसी क्षेत्र पर निर्भर करती है। ऐसी स्थिति में संस्थागत कृषि ऋण, विशेषकर वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम बैंकिंग माध्यमों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह शोध-पत्र राष्ट्रीय कृषि विकास में प्रगतिशील बैंकों की भूमिका का विश्लेषण करता है और यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक बैंकिंग केवल ऋण वितरण का माध्यम नहीं रही, बल्कि उत्पादक निवेश, फसल आधारित कार्यशील पूँजी, डेयरी मछलीपालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों, किसान क्रेडिट कार्ड, डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन और जोखिम न्यूनन की भी प्रमुख वाहक बन चुकी है। यह अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है। इसमें भारत सरकार के वित्तीय सेवा विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, नाबार्ड तथा संसद में प्रस्तुत आधिकारिक उत्तरों का उपयोग किया गया है। अध्ययन से ज्ञात होता है कि कृषि ऋण का आकार लगातार बढ़ा है. वाणिज्यिक बैंकों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही है, और हरियाणा जैसे राज्यों में 2019-20 से 2023-24 के बीच कृषि ऋण वितरण में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, किसान क्रेडिट कार्ड कवरेज के विस्तार ने ऋण पहुँच को व्यापक बनाया है। तथापि, क्षेत्रीय असमानता, छोटे और सीमांत किसानों तक पर्याप्त पहुँच, ऋण के उत्पादक उपयोग, ऋण-पुनर्भुगतान जोखिम, और डिजिटल विभाजन जैसी चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं। इसी आधार पर शोध पत्र अवसरों और चुनौतियों दोनों का संतुलित विवेचन प्रस्तुत करता है।




