वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मीराबाई की सार्थकता

Authors

  • डॉ. अनीता रानी Author

DOI:

https://doi.org/10.64675/fz3ngg44

Keywords:

मीराबाई, सामंतवाद, पितृसत्ता, स्त्री-मुक्ति, वैचारिक प्रतिरोध, आत्म-अस्मिता, श्रम-संस्कृति, समकालीन सार्थकता, अंतर्विभागीय न्याय, अहिंसक सत्याग्रह।

Abstract

प्रस्तुत शोध-प्रबंध मध्यकालीन भारत की सबसे प्रखर, विद्रोही और चेतना-संपन्न स्त्री मीराबाई के जीवन-दर्शन और उनके काव्य का समकालीन स्त्री-मुक्ति विमर्श के आलोक में एक अत्यंत विस्तृत और गहन अनुशीलन है। 16वीं शताब्दी का राजपूताना समाज कठोर सैन्य-सामंती संरचनाओं, पितृसत्तात्मक नियमों, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा और कठोर वैधव्य के बंधनों से जकड़ा हुआ था। ऐसे दमघोंटू परिवेश में मीराबाई ने न केवल अपनी व्यक्तिगत और आध्यात्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की, बल्कि राज्यसत्ता और कुल-मर्यादा के संस्थागत दवाबों को खुली चुनौती दी। यह शोध स्थापित करता है कि मीराबाई का गिरधर के प्रति अनुराग पारंपरिक रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक अधीनता से मुक्ति का एक सशक्त और व्यावहारिक माध्यम था। सर्वथा नवीन ऐतिहासिक स्रोतों, अप्रचलित पदों के गहन पाठ-विश्लेषण और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के आधार पर मीराबाई को समकालीन महिला सशक्तिकरण की एक कालजयी, वैश्विक और व्यावहारिक मिसाल के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया गया है।

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Published

2024-12-23