मीराबाई के साहित्य में रहस्य भावना

Authors

  • डॉ. अनीता रानी Author

DOI:

https://doi.org/10.64675/658pp523

Keywords:

मीराबाई, रहस्यभावना, माधुर्य भक्ति, अलौकिक विरह, अद्वैत तादात्म्य, मध्यकालीन काव्य, आत्मसमर्पण, स्त्री-विमर्श।

Abstract

मध्यकालीन भारतीय भक्ति आंदोलन के अंतर्गत सगुण कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई का स्थान अद्वितीय है। मीराबाई का काव्य मूलतः माधुर्य भाव की प्रेमाभक्ति का प्रतिमान है, किंतु उनके साहित्य में अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित 'रहस्यभावना' का स्वरूप अत्यंत विरल और गंभीर है। प्रस्तुत शोध-पत्र मीराबाई की पदावली में अभिव्यक्त रहस्यवादी चेतना का सूक्ष्म विवेचन करता है। सामान्यतः रहस्यवाद को निर्गुण संतों की थाती माना जाता रहा है, परंतु मीरा के काव्य में सगुण साकार 'गिरधर नागर' के प्रति जो अनन्य आत्मसमर्पण है, वह आगे चलकर आत्मा और परमात्मा के अद्वैत तादात्म्य में परिणत हो जाता है। इस शोध में मीरा की रहस्यभावना के विविध सोपानों-अलौकिक विरह की तीव्र अनुभूति, साधनात्मक एवं भावनात्मक प्रभाव, प्रियतम से मिलन का अतींद्रिय उल्लास तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह का समकालीन अकादमिक विमर्श के आलोक में मूल्यांकन किया गया है। अंततः यह सिद्ध किया गया है कि मीरा का रहस्यवाद शुष्क वेदांत या केवल हठयोग की जटिल प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वह हृदय की सहज, रागात्मक और उत्कट अनुभूति का चरम उत्कर्ष है जो भक्त को पूर्ण मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

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Published

2022-01-20