उत्तर-आधुनिकतावाद और भारतीय दर्शन: एक समालोचनात्मक संवाद
DOI:
https://doi.org/10.64675/4wn8v259Keywords:
उत्तर-आधुनिकतावाद, देरिदा, फूको, ल्योतार, भारतीय दर्शन, मेटानैरेटिव, विखण्डन, शून्यवाद, अनेकान्तवाद, ज्ञान-शक्ति, अद्वैत, आम्बेडकर, सत्य, भाषा-दर्शन, स्फोट।Abstract
उत्तर-आधुनिकतावाद (Postmodernism) बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उभरी वह दार्शनिक और सांस्कृतिक प्रवृत्ति है जो आधुनिकता के महाआख्यानों प्रगति, विज्ञान, कारण और सार्वभौमिक सत्य को मूलभूत रूप से चुनौती देती है। जैक देरिदा (Jacques Derrida), मिशेल फूको (Michel Foucault) और ज्यां-फ्रांस्वा ल्योतार (Jean-François Lyotard) इस विचारधारा के प्रमुख प्रतिनिधि हैं। देरिदा का 'विखण्डन' (Deconstruction), फूको का 'ज्ञान-शक्ति' (Power-Knowledge) सिद्धान्त और ल्योतार का 'मेटानैरेटिव का अन्त' ये तीनों उत्तर-आधुनिक दर्शन के केन्द्रीय प्रस्थापनाएँ हैं। प्रस्तुत शोध पत्र इन उत्तर-आधुनिक विमर्शों और भारतीय दार्शनिक परम्पराओं के बीच एक गहरा समालोचनात्मक संवाद स्थापित करता है। यह दर्शाया गया है कि नागार्जुन का शून्यवाद, जैन अनेकान्तवाद, अद्वैत वेदान्त, कश्मीर शैव दर्शन और आम्बेडकर की जाति-आलोचना ये सभी उत्तर-आधुनिक विमर्श से पूर्व ही अनेक उत्तर-आधुनिक प्रश्नों से गुजर चुकी थीं। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि भारतीय परम्पराएँ कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में उत्तर-आधुनिकतावाद की सीमाओं को पार करती हैं- विशेषकर नैतिकता, करुणा और सकारात्मक रूपान्तरण के आयामों में। ज्ञान, शक्ति और सत्य की भारतीय दृष्टि से पुनर्व्याख्या करते हुए एक नए 'भारतीय उत्तर-आधुनिक विमर्श' की संभावना रेखांकित की गई है।




