पर्यावरण नीतिशास्त्र : प्रकृति के प्रति मानव के दायित्व का दार्शनिक परीक्षण

Authors

  • डॉ सच्चिदानंद मिश्र Author

DOI:

https://doi.org/10.64675/ng9gy285

Keywords:

पर्यावरण नीतिशास्त्र, प्रकृति, मानव दायित्व, मानवकेन्द्रवाद, जीवकेन्द्रवाद, पारिस्थितिकी-केन्द्रवाद, गहरी पारिस्थितिकी, जलवायु न्याय, अहिंसा, वसुधैव कुटुम्बकम्, सतत विकास, जैव-विविधता ।

Abstract

पर्यावरण नीतिशास्त्र (Environmental Ethics) दर्शनशास्त्र की वह शाखा है जो प्रकृति, पारिस्थितिकी और समस्त जीवजगत के प्रति मानव के नैतिक दायित्वों का विवेचन करती है। वर्तमान युग में जब जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का ह्रास, वनों की अंधाधुंध कटाई, जल-संकट और वायु प्रदूषण जैसी समस्याएँ विश्वव्यापी संकट का रूप ले चुकी हैं, तब यह प्रश्न अत्यन्त प्रासंगिक हो जाता है कि प्रकृति के प्रति मानव का क्या दायित्व है और इस दायित्व का दार्शनिक आधार क्या है। प्रस्तुत शोध पत्र पाश्चात्य और भारतीय दार्शनिक परम्पराओं के प्रकाश में पर्यावरण नीतिशास्त्र के विविध आयामों का परीक्षण करता है। इसमें मानवकेन्द्रवाद (Anthropocentrism), जीवकेन्द्रवाद (Biocentrism), पारिस्थितिकी केन्द्रवाद (Ecocentrism) और गहरी पारिस्थितिकी (Deep Ecology) जैसे प्रमुख दार्शनिक दृष्टिकोणों का समालोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। साथ ही भारतीय दर्शन में वसुधैव कुटुम्बकम्, अहिंसा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, पंचभूत की अवधारणाएँ और गाँधी के ट्रस्टीशिप सिद्धान्त को पर्यावरणीय नैतिकता के वैकल्पिक आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि पर्यावरण संकट मूलतः एक नैतिक और दार्शनिक संकट है जिसके समाधान के लिए एक समग्र, समावेशी और टिकाऊ पर्यावरणीय नैतिकता की आवश्यकता है।

Downloads

Published

2026-01-24