योग दर्शन और मानसिक स्वास्थ्य : एक समकालीन दार्शनिक विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.64675/tmw2ag74Keywords:
योग दर्शन, अष्टांग योग, मानसिक स्वास्थ्य, चित्तवृत्ति, पतंजलि, चित्तवृत्तिनिरोध, क्लेश, समाधि, माइन्डफुलनेस, CBT, MBSR, समग्र चिकित्सा, पुरुष-प्रकृति, कैवल्य।Abstract
योग दर्शन भारतीय षड्दर्शन की एक सुव्यवस्थित और अत्यन्त व्यावहारिक दार्शनिक परम्परा है जिसकी नींव महर्षि पतंजलि के 'योगसूत्र' पर आधारित है। पतंजलि ने योग को 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध के रूप में परिभाषित किया। यह परिभाषा न केवल एक आध्यात्मिक उद्घोषणा है, बल्कि एक गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक प्रकथन भी है। वर्तमान युग में जब अवसाद, चिन्ता-विकार, तनाव, PTSD और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ महामारी का रूप ले चुकी हैं, तब योग दर्शन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। प्रस्तुत शोध पत्र पतंजलि के अष्टांग योग और चित्तवृत्तिनिरोध की अवधारणाओं तथा आधुनिक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों – विशेषकर CBT, MBSR, DBT और सकारात्मक मनोविज्ञान के मध्य एक विस्तृत दार्शनिक तुलना प्रस्तुत करता है। यह परीक्षण किया गया है कि योग दर्शन की मूल अवधारणाएँ समकालीन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए न केवल पूरक, बल्कि कुछ क्षेत्रों में श्रेष्ठतर समाधान भी प्रस्तुत करती हैं। शोध पत्र में वैज्ञानिक प्रमाणों, दार्शनिक विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया गया है कि एक एकीकृत मन-शरीर-आत्मा उपचार दृष्टिकोण ही आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य संकट का समग्र समाधान हो सकता है।




