वैश्वीकरण और सांस्कृतिक पहचान : दार्शनिक चुनौतियाँ एवं समाधान
DOI:
https://doi.org/10.64675/dcay5v26Keywords:
वैश्वीकरण, सांस्कृतिक पहचान, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, बहुलवाद, सांस्कृतिक सापेक्षवाद, संकरीकरण, विश्व-नागरिकता, मानवाधिकार, सांस्कृतिक विविधता, स्थानीयकरण, सांस्कृतिक संवाद, अस्मिता।Abstract
वैश्वीकरण (Globalization) समकालीन विश्व की सर्वाधिक प्रभावशाली और बहुआयामी प्रक्रिया है। इसने आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और सांस्कृतिक स्तरों पर विश्व को एक अभूतपूर्व अन्तःसम्बद्धता प्रदान की है। किन्तु इस प्रक्रिया के साथ सांस्कृतिक पहचान (Cultural Identity) का गहरा संकट भी उत्पन्न हुआ है। जब एक वैश्विक संस्कृति - प्रायः पश्चिमी और विशेषकर अमेरिकी अन्य संस्कृतियों पर हावी होने लगती है, तो स्थानीय भाषाएँ, परम्पराएँ, मूल्य प्रणालियाँ और जीवन-दृष्टियाँ संकट में पड़ जाती हैं। प्रस्तुत शोध पत्र दार्शनिक दृष्टिकोण से वैश्वीकरण और सांस्कृतिक पहचान के जटिल अन्तर्सबंध का परीक्षण करता है। इसमें सांस्कृतिक पहचान की दार्शनिक अवधारणा, वैश्वीकरण की प्रकृति एवं स्वरूप, इससे उत्पन्न दार्शनिक चुनौतियाँ तथा उनके सम्भव समाधानों का विस्तृत विवेचन किया गया है। पाश्चात्य दार्शनिक परम्पराओं हेगेल, हर्डर, हेबरमास, टेलर तथा भारतीय दार्शनिक चिन्तन टैगोर, गाँधी, अम्बेडकर, अरविन्द के आलोक में यह विचार किया गया है कि वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता को कैसे संरक्षित किया जाए और एक न्यायसंगत, बहुलवादी विश्व-व्यवस्था कैसे स्थापित की जाए।




