प्राचीन भारत की आर्थिक नीतियाँ: आज के संदर्भ में एक ऐतिहासिक विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.64675/shodhbodh.v4.i1.17Keywords:
समृद्धि, नैतिकता, पर्यावरणीय, न्यायसंगतAbstract
भारतीय इतिहास के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि हमारे पूर्वजों के लिए अर्थव्यवस्था मात्र धन अर्जन का साधन नहीं थी; इसका दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक और समग्र था। वैदिक काल से लेकर मौर्य और गुप्त साम्राज्य तक, भारतीय आर्थिक व्यवस्था में एक अद्वितीय संतुलन दृष्टिगोचर होता है। यहाँ आर्थिक समृद्धि को नैतिकता के साथ जोड़ा गया, विकास में पर्यावरणीय संरक्षण को महत्व दिया गया, और राज्य का मुख्य उद्देश्य केवल कर वसूली न होकर प्रजा का सर्वांगीण कल्याण सुनिश्चित करना था। इस संदर्भ में, आचार्य चाणक्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' (लगभग 300 ईसा पूर्व) एक अमूल्य धरोहर है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी अक्षुण्ण है। कौटिल्य ने राज्य को एक 'कल्याणकारी संस्था' के रूप में परिभाषित किया, जिसकी सफलता का मापदंड प्रजा की प्रसन्नता है। उनके अनुसार, 'अर्थ' (संपत्ति) आवश्यक है, परंतु यह 'धर्म' (नैतिकता) से विलग नहीं हो सकता। शासक का प्रथम और सर्वोच्च उत्तरदायित्व प्रजा की सुरक्षा, भरण-पोषण और समृद्धि सुनिश्चित करना था। तत्कालीन नीतियां अत्यंत प्रगतिशील और दूरदर्शी थीं। कर प्रणाली न्यायसंगत थी, जहाँ निर्धनों पर भार कम और संपन्न वर्ग पर अधिक था। आम जनता के हित में बाज़ार मूल्यों को नियंत्रित रखा जाता था और एकाधिकार पर सख्त प्रतिबंध था। इसके अतिरिक्त, व्यापारिक हितों के लिए 'श्रेणी' व्यवस्था थी जो आधुनिक ट्रेड यूनियनों के समान कार्य करती थी। साथ ही, समाज के कमज़ोर वर्गों जैसे महिलाओं, वृद्धों और अनाथों के लिए सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान था।




