समाज के विकास में लोक साहित्य की भूमिका

Authors

  • डॉ. अल्पना मिश्रा Author

Keywords:

लोक साहित्य, सामाजिक विकास, सांस्कृतिक धरोहर, लोककथाएँ, लोकगीत, सामाजिक चेतना, नैतिक मूल्य, मौखिक परंपरा।

Abstract

लोक साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक धरोहर का अभिन्न अंग होता है। यह वह साहित्यिक परंपरा है जो मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है और समाज की सामूहिक चेतना को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। प्रस्तुत शोध पत्र में समाज के विकास में लोक साहित्य की भूमिका का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। लोक साहित्य लोकगीत, लोककथाएँ, लोकनाट्य, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, पहेलियाँ एवं लोक काव्य आदि के रूप में समाज में विद्यमान रहता है। यह न केवल मनोरंजन का साधन है, अपितु सामाजिक शिक्षा, नैतिक मूल्यों के संवर्धन, सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण, सामाजिक एकता और जागरूकता के प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस शोध में लोक साहित्य के विभिन्न आयामों का परीक्षण करते हुए सामाजिक विकास में इसके योगदान को रेखांकित किया गया है। अध्ययन में पाया गया है कि लोक साहित्य सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनकर समाज को नई दिशा देने में सक्षम है।

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Published

2026-03-24